Archive for सितम्बर, 2011

जहाँ मेरे शब्द नहीं जाते…

ऐसी कौन सी जगह जहाँ मेरे शब्द नहीं जाते,
जहाँ-जहाँ जाता हूँ मैं बस वहीं नहीं जाते।

मुझे भी आदमियों की अब समझ होने लगी,
तभी तो अब हर किसी के करीब हम नहीं जाते।

तुम्हारी फितरत कि आम तुम कभी बन नहीं सकते,
हमारा उसूल कि किसी खास के दर पर हम नहीं जाते।

जो जाते हैं तो दिन भर में हजारों बार जाते हैं,
नहीं जाते तो ता-उम्र किसी के घर नहीं जाते।

यहाँ पर कौन सी मंजिल को पाने के लिए आया,
यहाँ तो दूर-दूर तक कहीं रस्ते नहीं जाते।

हाथ का ख़ंज़र नजर आने लगा है…

अच्छा हुआ कि तेरा बुरा वक्त अब जाने लगा है,
कम से कम तेरा असली चेहरा नजर आने लगा है…

इस सफर के आखिरी दौर तक हमसफ़र बनके जो रहा,
छुपा हुआ उसके हाथ का ख़ंज़र नजर आने लगा है…

कौन जाने किस जगह कब साथ मेरा छोड़ दे तू,
अब तुझे मुझसे हसीं हर हमसफ़र नजर आने लगा है…

आखिरी वक्त तक जो साथ निभाने का वादा किये थे,
हर उस वादे का अब आखिरी वक्त नजर आने लगा है…

अपने ख़ूँ से जिस शजर को सींचता आया अभी तक,
मेरे ही ख़ूँ का प्यासा अब वो शज़र नज़र आने लगा है…

देखना है किसके हक में आएगा अब तेरा फैसला,
ऐ ख़ुदा! इंसान तुझसे खौफज़द नज़र आने लगा है।

विसंग‍‍ति…

क्‍या रिम‍-झिम बरसात हुई है…!

मिट गए होंगे वो शब्‍द
जो लिखे गए होंगे रेत पर
आसानी से‍ अपनी बात कह सकने के लिए…

अभी अभी जो बने थे
रेत के घर
हो गए होंगे अस्‍तित्‍वहीन…

रह गए होंगे
केवल वे संवाद
जो लिखे गए होंगे किसी पत्‍थर पर
किसी पत्‍थर के द्वारा…

बच गया होगा केवल उनका अस्‍तित्‍व
जिन‍के घर की दीवारें
सक्षम हैं
प्रकृति को
उनके घर के बाहर ही रोक पाने में…

अनमोल रत्न

एक अमूल्य संकलन

अपनी बात

भावनाओं के संप्रेषण का माध्यम।

नजरिया

बात जो है खास ....

Civil Services Exam Help

A brief and to the point view and materials on BPSC , JPSC and UPSC Exams

जिसके आगे राह नहीं...

तमन्‍ना

जिसके आगे राह नहीं...

कस्‍बा qasba

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आखिरी पथ...

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संवेदना

कोशिश मशीनी पड़ रहे मस्तिष्क में भावना-प्रवाह की'

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चक्रधर की चकल्लस

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जिसके आगे राह नहीं...

Swapnesh Chauhan

जिसके आगे राह नहीं...

अनोखा

साफ कहना, सुखी रहना

यह भी खूब रही

यह भी खूब रही। (Yah bhi khoob rahi)

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