Archive for फ़रवरी, 2011

हर कोई…

हर कोई
अपने
दुःखों में
तर मिलता है,

जब कोई
कंधा
तलाशता हूँ
तो
सर
मिलता है।

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पत्थर

अरे मुसाफिरों!
मुझे
इस तरह से ना कुचलो
क्योंकि
वह दिन दूर नहीं
जब तुम
मुझे
किसी मंदिर में
स्थापित पाओगे
और
मुझसे ही
अपनी
मनोकामनाओं की
पूर्ति चाहोगे
इसलिए
अरे मुसाफिरों
मुझे
इस तरह से ना कुचलो।

कह रही है मंज़िल…

कह रही है मंज़िल हमें पाकर तो देखिए-२
खुद ही बढ़ जाएँगे कदम उठाकर तो देखिए
ये तो मील के पत्थर हैं इनसे कैसी मोहब्बत-२
बहुत मिल जाएँगे आगे कहीं जाकर तो देखिए
साहिल तो मिल जाएँगे सुंदर से सुंदर-२
दरिया के रास्ते से जाकर तो देखिए
बहुत मिल जाएँगे तुमको नायाब खिलौने-२
कुम्हार के घर दस्तक बजाकर तो देखिए
ना होगा कोई द्वेष कोई राग किसी के मन में-२
यहीं पे छोड़कर उनको, मंज़िल पाकर तो देखिए
मिल जाएँगे छूटे हुए सब राही आपको-२
मंजिल पे पहुँचकर, आँख घुमाकर तो देखिए
कह रही है मंज़िल हमें पाकर तो देखिए
खुद ही बढ़ जाएँगे कदम उठाकर तो देखिए।

हम किस ओर जा रहे हैं…

जिन पैरों के नीचे अपनी गर्दन फँसी हुई हो उन पैरों को सहलाते रहने में ही अपनी भलाई होती है। प्रेमचंद जी ने बहुत पहले जो रेखाचित्र किसानों का खींचा था वह आज भी वैसा का वैसा ही देखा जा सकता है, बशर्ते इस बीच गंगा में काफी पानी बह चुका है। देश अपनी गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ चुका है और ‘राय साहब’ जैसी उपाधियों को बाँटे जाने का सिलसिला खत्म हो चुका है, जमीदारी प्रतिबंधित हो गई है। लोकतांत्रिक रूप से १५ चुनाव संपन्न हो चुके हैं। जनता लगभग सभी दलों पर भरोसा करके देख चुकी है फिर भी इस कृषि प्रधान देश का किसान आज भी आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहा है। उस वक्त जब देश गुलाम था और प्रेमचंद जी ने गोदान की रचना की थी तब अँग्रेजों के ज़माने के किसान ने भी जीवन के प्रति आशा इतनी कभी नहीं छोड़ी थी कि आत्महत्या कर ले। गोदान का नायक होरी भी किसान से मजदूर बन गया था और लगातार विपन्नता को सहते हुए भी आत्महत्या नहीं की थी, वह अत्यधिक काम करने के कारण मरा था। किन्तु आज के आजाद भारत का किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है। कहा जाता है कि हमारे देश के किसान में जीवटता इतनी अधिक होती है कि अगर कोई शख्स सबसे अंत में आत्महत्या करेगा तो वह किसान होगा अर्थात् वह तभी आत्महत्या करता है जब जीवित रहने का कोई विकल्प ही नहीं रह जाता।

एक तरफ विकास के सरकारी आँकड़े जो कि बहुत जल्द ही भारत को विकसित बना देने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था की इकाई किसान की आत्महत्याओं की दिन-प्रतिदिन आती खबरों को देखता हूँ तो पशोपेश में पड़ जाता हूँ कि सच क्या है? असमंजस और बढ़ जाता है जब बाज़ार में जाकर आटे-दाल का भाव मालूम करता हूँ कि कृषि पदार्थों के दाम आकाश छू रहे हैं फिर माननीय कृषि मंत्री जी का बयान कि दाम बढ़ाने में किसानों का हाथ है।
अगर बढ़े हुए दामों का फायदा किसानों को मिल रहा है तो फिर वे आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? और अगर किसान मजबूर होकर आत्महत्या कर रहे हैं तो फिर क्या भारत का विकास हो रहा है? खासकर गांधी के भारत का जो कि गाँव में बसता है?
ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो कि आम आदमी के दिमाग में उठते तो हैं लेकिन इस कागजी लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व ‘चुनाव’ के दौरान संविधान नाम की एक बहुत पुरानी किताब में वर्णित आचार संहिता का उल्लंघन करके बँटवाई गई शराब के नशे में ये आम आदमी कुछ दिनों के लिए भूल जाता है नेताओं द्वारा बाँटे गए अन्य उपहारों के नशे में चूर होकर मतदान कर आता है। चुनाव परिणाम आते ही उसका नशा चूर-चूर हो जाता है किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्योंकि उस संविधान नामक पुरानी किताब में जनप्रतिनिधियों को जनता द्वारा अपदस्थ करने का कोई प्रावधान नहीं लिखा गया था। आज किसी भी सांसद की कल्पना करते हुए गाड़ियों का काफिला तो याद आता है किंतु गली-मोहल्ले में बैठक कर समाज की समस्याओं को सुलझाते हुए किसी चेहरे की कल्पना हमारा मन नहीं कर पाता।
हमारी अर्थव्यवस्था की इकाई किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ रहा है अतः कहा जा सकता है कि स्थिति अँग्रेजी राज से भी बदतर हो चुकी है। तब हम जानते थे कि गोरी चमड़ी वाले अँग्रजों को देश से निकाल बाहर करना है किन्तु आज मानवता के दुश्मनों की पहचान गोरी चमड़ी नहीं रही और हम उनको देश से बाहर भी नहीं निकाल सकते।
देश को आजादी दिलाने के बाद जो जनता चैन की नींद सोने चली गई थी उसको अपनी सामाजिक चेतना जागृत करने का समय आ गया है। अब समय आ गया है कि हम जाति, धर्म व संप्रदाय के नाम पर हो रही राजनीति को तिलांजलि देकर विकास को प्रमुख मुद्दा बनाएँ और सबसे बड़ी बात कि हम विकास के लिए केवल सरकार पर ही निर्भर ना रहें। हम स्वयं ही विकास की पहल करें और मानवजाति की सेवा में निस्वार्थ भाव से अपनी क्षमताओं के अनुसार लग जाएँ।

बना लिया है अब खुद में समन्दर अपना…

मैं ही नाविक हूँ, मैं ही साहिल अपना;
बना लिया है अब खुद में समन्दर अपना।

इस कदर बिखरा हूँ मैं तिनका-तिनका
कि हर बनावट में नज़र आता है कुछ-कुछ नक्श अपना।

खुद में बनते हैं और खुद में बिखर जाते हैं,
अरमां भी सीख गए हैं अब रंग अपना।

खुद अपने मसीहा हैं खुद अपने पुजारी,
खुद चाहता हूँ पसंद करे ना कोई संग अपना।

खुद ही शुरू हुआ था मैं अपने आप से,
खुद ही लिख रहा हूँ अब समापन अपना।

अनमोल रत्न

एक अमूल्य संकलन

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