Archive for अप्रैल, 2011

कच्चे पारे की मूरत…

लाख कोशिशें कर लो
वो
किसी के
हाथ
नहीं आएगी
वो
कच्चे पारे की
मूरत है
जितना
पकड़ना चाहोगे
टूटती ही जाएगी
बिखरती ही जाएगी
इसलिए
बेहतर है कि
उसका दीदार
दूर से ही करो…।

“सच्चा मित्र”

शब्द ही बताता है
कि
किसी मित्र ने
सरेशाम
लूट ली होगी
मित्रता की इज्जत
भरे बाजार में…
घोप दिया होगा
छुरा
चुपके से
मित्र की
पीठ में…
वरना…
मित्र का मतलब ही
‘सच्चा’
हुआ करता था
कभी…।

मौलिक रचना…

पलकें बन्द करते ही
बिछ जाते हैं
कितने ही
कोरे कागज
मेरे हृदय में

लिख जाते हैं
रोज
कितने ही अफसाने

इन कागजों की डोर
मेरी पलकों में बँधी लगती है
क्योंकि
पलकें खोलते ही
सारे अफसाने
हो जाते हैं गायब

और
जब तुम कहते हो
कि
पढ़नी है मेरी मौलिक रचना
तो
कलम, कागज, दवात लेकर
लिख देता हूँ
एक रचना
जो निश्चित ही
मेरे अवचेतन की रचना
नहीं होती

जबकि
मेरी मौलिक रचना
मेरे अचेतन में लिखी जा रही होती है

जो
अभी तक की वैज्ञानिक खोजों के अनुसार
किसी भी सोशल नेटवर्किंग साईट पर
अपडेट नहीं हो सकता
किसी भी मोबाइल से
एस एम एस नहीं हो सकता
किसी भी ई-मेल में
अटैच नहीं हो सकता

उसको पढ़ने के लिए
चाहिए ही होता है
वक्त

जो शायद कभी भी
हमने
एक-दूसरे को दिया ही नहीं

और
मेरे चेहरे की मुस्कुराहट की तरह
तुम
उस रचना की भी तारीफ कर देते हो
जो
शायद कभी मेरी मौलिक होती ही नहीं…

आईना…

आईना
जितना कमजोर होता है,
इरादों से
उतना ही मजबूत
होता है,
वह
प्रत्यक्ष को
दिखलाने वाला होता है,
जितने टुकड़े करो उसके
वह
उतने ही पुरजोर तरीके से
सच का प्रस्तुतकर्ता
होता है।

फिर भी…

उसमें वो हर ख़ूबी,

जो ख़ुद में

नहीं लाना चाहता हूँ मैं,

फिर भी,

अपने नक़ाब में

समाना चाहता हूँ मैं…।

ऐसे – ऐसे मंज़र देखे हैं…

हमने तो ऐसे – ऐसे मंज़र देखे हैं,
जहाँ कोई रस्ता नहीं जाता वहाँ पर घर देखे हैं।

जिन लोगों को हरदम खिलखिलाते देखा,
उन सब लोगों के चश्म हमने तर देखे हैं।

उन्हें सहारा कभी किसी का नहीं चाहिए,
जिनकी पीठ पर बोझ हम हरदम देखे हैं।

ये मत पूछो हमसे हमपे क्या गुजरा है,
दिल से पूछो उसने कितने सितम देखे हैं।

सारी बर्फ सारे पत्थर पिघल ना जाएँ,
इसीलिए लब पर पहरे हरदम देखे हैं।

मानते हैं हम कि उम्र अभी हमारी कम है,
लेकिन हमने तुमसे ज्यादा मौसम देखे हैं।

दुनिया को दुनिया में हमने उलझा देखा,
लेकिन अपने को अपने ही में रम देखे हैं।

अनमोल रत्न

एक अमूल्य संकलन

अपनी बात

भावनाओं के संप्रेषण का माध्यम।

नजरिया

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यह भी खूब रही। (Yah bhi khoob rahi)

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