Posts Tagged ‘कविता’

तुम्हारी बज़्म में मेरी अब जगह ही नहीं…

खामोशियाँ

तुम्हारी बज़्म में मेरी अब जगह ही नहीं,

अदब में झुकने का मतलब नहीं, कि अना ही नहीं…

शिकवे भी बहुत थे, बहुत थी तारीफ़ें

खामोशियाँ चीखती रहीं पर तूने कभी सुना ही नहीं…

सच की हिफ़ाज़त में खुद को फ़ना कर जाएँ,

तमाम क़ाफ़िलों में अब ये तमन्ना ही नहीं…

हमारे सामने जो हमज़ुबाँ थे उनमें से,

मुंसिफे-दरबार में देखा कि किसी की जुबाँ ही नहीं…।

रवायत नई, अब समझने लगे हैं…

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मुखौटे एक-एक कर उतरने लगे हैं,
ओ दुनिया तुम्हें हम समझने लगे हैं।

आँखों में अदावत और हाथों का मिलना,
रवायत नई, अब समझने लगे हैं।

बेतकल्लुफ़ी से मिलते थे सब,
अब पहले मिज़ाज परखने लगे हैं।

नई फिज़ा है निज़ाम की अब,
सच बोलने वाले सब खटकने लगे हैं।

भटकते थे पहले अंधेरे में लोग,
अब चकाचौंध में राह भटकने लगे हैं।

मैं करता रहा अपनाने की कोशिश…

मैं करता रहा अपनाने की कोशिश,
वो करते रहे आज़माने की कोशिश…

ये दुनिया है या कोई बियाबान है?
हर तरफ निर्बलों को दबाने की कोशिश…

खुद अपने को हम सुन ना पाए कभी,
फिर भी दुनिया को हर दम सुनाने की कोशिश…

ये शऊर दुनिया में कहाँ से है आया,
हर तरफ रिश्तों को भुनाने की कोशिश…

हर महफिल में जाते लगाकर मुखौटा,
खुद के सच को हमेशा छिपाने की कोशिश…

इस अज़ब रेस में आ गया कहाँ से?
यहाँ दौड़ने से ज्यादा गिराने की कोशिश…

बस ख़यालों में मेरे बसा एक तू ही,
हर पल तेरी मूरत बनाने की कोशिश…।

जहाँ मेरे शब्द नहीं जाते…

ऐसी कौन सी जगह जहाँ मेरे शब्द नहीं जाते,
जहाँ-जहाँ जाता हूँ मैं बस वहीं नहीं जाते।

मुझे भी आदमियों की अब समझ होने लगी,
तभी तो अब हर किसी के करीब हम नहीं जाते।

तुम्हारी फितरत कि आम तुम कभी बन नहीं सकते,
हमारा उसूल कि किसी खास के दर पर हम नहीं जाते।

जो जाते हैं तो दिन भर में हजारों बार जाते हैं,
नहीं जाते तो ता-उम्र किसी के घर नहीं जाते।

यहाँ पर कौन सी मंजिल को पाने के लिए आया,
यहाँ तो दूर-दूर तक कहीं रस्ते नहीं जाते।

हाथ का ख़ंज़र नजर आने लगा है…

अच्छा हुआ कि तेरा बुरा वक्त अब जाने लगा है,
कम से कम तेरा असली चेहरा नजर आने लगा है…

इस सफर के आखिरी दौर तक हमसफ़र बनके जो रहा,
छुपा हुआ उसके हाथ का ख़ंज़र नजर आने लगा है…

कौन जाने किस जगह कब साथ मेरा छोड़ दे तू,
अब तुझे मुझसे हसीं हर हमसफ़र नजर आने लगा है…

आखिरी वक्त तक जो साथ निभाने का वादा किये थे,
हर उस वादे का अब आखिरी वक्त नजर आने लगा है…

अपने ख़ूँ से जिस शजर को सींचता आया अभी तक,
मेरे ही ख़ूँ का प्यासा अब वो शज़र नज़र आने लगा है…

देखना है किसके हक में आएगा अब तेरा फैसला,
ऐ ख़ुदा! इंसान तुझसे खौफज़द नज़र आने लगा है।

जीने वालों के लिए नज़ीर हो गया हूँ…

तुमसे जितना ज़्यादा मैं दूर हो गया हूँ,
खुद के नशे में उतना ही चूर हो गया हूँ…।

तुम साथ होते तो अधूरा ही रहता,
तुम्हारे बिन सम्पूर्ण हो गया हूँ…।

अब मुड़ना यहाँ से मुनासिब नहीं है,
पीछे वालों के लिए मैं पीर हो गया हूँ…।

कभी जीना भी था मुहाल और अब,
जीने वालों के लिए नज़ीर हो गया हूँ…।

तूफान में अकेला दिया…

भयंकर तूफान में अकेला दिया मैं जल रहा हूँ,
बस इसी कारण हर किसी को ख़ल रहा हूँ…।

हर कदम पे ठोकरें मार देता है ज़माना,
बस इसी कारण आज तक मैं चल रहा हूँ…।

एक बस तूने मुझे आज तक ठुकराया नहीं,
हर दर से ठोकर खाकर इसीलिए मचल रहा हूँ…।

सफ़र का अन्त तेरे दीदार से करना है मुझे,
विष से सिंचित होकर भी इसीलिए तो फल रहा हूँ…।

मौत भी आएगी मुझे हर वादा निभाने के बाद,
आज तक मैं अपनी हर बात पर अटल रहा हूँ…।

सोचकर चले थे कि रस्ता छोटा है…

मर्ज़ जब लाइलाज़ होता है,
तभी क्यों जमकर इलाज़ होता है?

कश्ती चलाने को बादवाँ* काफी था,
नाखुदा* क्यों सवार होता है?

ज़िन्दा रहने पर शोक करते हैं लोग,
यहाँ मर जाने पर मल्हार होता है।

पुकार-पुकार के थक गया तुझको,
क्या सच है कि खुदा सोता है?

तुझे और सिर्फ तुझे चाहा किया,
तुझे पाकर ये यकीं नहीं होता है।

ये कैसा मोड़ है ज़िन्दगी तेरा,
यहाँ हर आदमी क्यों रोता है?

हर एक आँख का निशाना है जो,
वो आँख खोलकर आज सोता है।

मृग मरीचिकाओं से हूँ घिरा हुआ,
अब मेरी आँख भी एक धोखा है।

नए दौर में हो जाएगा नीलाम,
सम्भालकर रखना जो सिक्का खोटा है।

बहुत दूर निकल आए अपने घर से हम,
सोचकर चले थे कि रस्ता छोटा है।

*बादवाँ= पाल (जिससे हवा के सहारे नाव चलती है)
*नाखुदा= नाविक

कागज़ पे बिखर जाता हूँ…

नक्श-ए-इमरोज* से आगे जब निगाह दौड़ाता हूँ,
खुद को फैला हर जगह और खुद में सिमटा हुआ पाता हूँ ।

जब कभी आज के हालात पर निगाह उठाता हूँ,
खुद को तन्हा दूर बहुत दूर तलक पाता हूँ ।

और जब अतीत के दरवाजे से गुजर आता हूँ,
खुद के टुकड़े जोड़कर कागज़ पे बिखर जाता हूँ…।

*इमरोज= वर्तमान

क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…

क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?
इस जहाँ के सुख में हँसने,
और
दुःख में रोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

क्या आजीविका कमाने और
खाने, पीने, सोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

अतीत की फसलें काटने
और नई बोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

इस समूचे संसार के
एक अदद कोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

जि़न्दगी की भागदौड़ में
अपने अस्तित्त्व को
अंततः खोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

क्या खूब तेरी मेरी दासताँ…

क्या खूब तेरी मेरी दासताँ रही,
तू सामने रहा फिर भी दूरियाँ रहीं।

मिलते रहे हमेशा पर मिल ना सके कभी,
ना जाने कैसी तेरी मज़बूरियाँ रहीं?

हम तो हमेशा ही से तुम्हारे करीब रहे,
तुम्हारे ऐनक ही में कुछ कमजोरियाँ रहीं।

जब भी मिले वो हमसे तो दूर ही से मिले,
दुनिया की नज़रों में हमेशा करीबियाँ रहीं।

हम बखूबी जानते हैं उनके बोलने का मतलब,
दुनियावी शिष्टाचारों की बेडि़याँ रहीं।

अज़ब कि तू मुझसे रू-ब-रू है…

जहाँ तक आरजू जाती है मेरी
वहाँ तक सिर्फ तेरी आरज़ू है

जितनी राहें तुझ तक जा रही हैं
वहाँ पर सिर्फ तेरी जुस्तज़ू है

अजब ये तुझसे मेरी गुफ्तगू है
मेरे हर लफ़्ज़ में छिपा सिर्फ तू है

हुआ ना मैं कभी रू-ब-रू खुद से
अज़ब कि तू मुझसे रू-ब-रू है।

जि़न्दगी की नदी में…

जि़न्दगी की नदी में
हर एक तट से
अलग
रहना पड़ेगा
हाँ!
तुम्हें बहना पड़ेगा,
हम करेंगे
भला क्या अर्पण?
हाँ!
तटों के
विसर्जन भार को
उम्र भर
सहना पड़ेगा,
हाँ!
तुम्हें बहना पड़ेगा।

कच्चे पारे की मूरत…

लाख कोशिशें कर लो
वो
किसी के
हाथ
नहीं आएगी
वो
कच्चे पारे की
मूरत है
जितना
पकड़ना चाहोगे
टूटती ही जाएगी
बिखरती ही जाएगी
इसलिए
बेहतर है कि
उसका दीदार
दूर से ही करो…।

“सच्चा मित्र”

शब्द ही बताता है
कि
किसी मित्र ने
सरेशाम
लूट ली होगी
मित्रता की इज्जत
भरे बाजार में…
घोप दिया होगा
छुरा
चुपके से
मित्र की
पीठ में…
वरना…
मित्र का मतलब ही
‘सच्चा’
हुआ करता था
कभी…।

मौलिक रचना…

पलकें बन्द करते ही
बिछ जाते हैं
कितने ही
कोरे कागज
मेरे हृदय में

लिख जाते हैं
रोज
कितने ही अफसाने

इन कागजों की डोर
मेरी पलकों में बँधी लगती है
क्योंकि
पलकें खोलते ही
सारे अफसाने
हो जाते हैं गायब

और
जब तुम कहते हो
कि
पढ़नी है मेरी मौलिक रचना
तो
कलम, कागज, दवात लेकर
लिख देता हूँ
एक रचना
जो निश्चित ही
मेरे अवचेतन की रचना
नहीं होती

जबकि
मेरी मौलिक रचना
मेरे अचेतन में लिखी जा रही होती है

जो
अभी तक की वैज्ञानिक खोजों के अनुसार
किसी भी सोशल नेटवर्किंग साईट पर
अपडेट नहीं हो सकता
किसी भी मोबाइल से
एस एम एस नहीं हो सकता
किसी भी ई-मेल में
अटैच नहीं हो सकता

उसको पढ़ने के लिए
चाहिए ही होता है
वक्त

जो शायद कभी भी
हमने
एक-दूसरे को दिया ही नहीं

और
मेरे चेहरे की मुस्कुराहट की तरह
तुम
उस रचना की भी तारीफ कर देते हो
जो
शायद कभी मेरी मौलिक होती ही नहीं…

आईना…

आईना
जितना कमजोर होता है,
इरादों से
उतना ही मजबूत
होता है,
वह
प्रत्यक्ष को
दिखलाने वाला होता है,
जितने टुकड़े करो उसके
वह
उतने ही पुरजोर तरीके से
सच का प्रस्तुतकर्ता
होता है।

फिर भी…

उसमें वो हर ख़ूबी,

जो ख़ुद में

नहीं लाना चाहता हूँ मैं,

फिर भी,

अपने नक़ाब में

समाना चाहता हूँ मैं…।

ऐसे – ऐसे मंज़र देखे हैं…

हमने तो ऐसे – ऐसे मंज़र देखे हैं,
जहाँ कोई रस्ता नहीं जाता वहाँ पर घर देखे हैं।

जिन लोगों को हरदम खिलखिलाते देखा,
उन सब लोगों के चश्म हमने तर देखे हैं।

उन्हें सहारा कभी किसी का नहीं चाहिए,
जिनकी पीठ पर बोझ हम हरदम देखे हैं।

ये मत पूछो हमसे हमपे क्या गुजरा है,
दिल से पूछो उसने कितने सितम देखे हैं।

सारी बर्फ सारे पत्थर पिघल ना जाएँ,
इसीलिए लब पर पहरे हरदम देखे हैं।

मानते हैं हम कि उम्र अभी हमारी कम है,
लेकिन हमने तुमसे ज्यादा मौसम देखे हैं।

दुनिया को दुनिया में हमने उलझा देखा,
लेकिन अपने को अपने ही में रम देखे हैं।

पूछना आपका…

पूछना आपका
कि
हाल कैसा है?
कहते हुए
कि
‘अच्छा है’
दिल में
मलाल
कैसा है!!!

आदमी से मुखौटा होता जा रहा हूँ…

ज्यों-ज्यों बड़ा होता जा रहा हूँ ,
आदमी से मुखौटा होता जा रहा हूँ।

भीड़ पूजा मेरी करने लगी है,
मैं मूर्ति सा जड़ होता जा रहा हूँ।

आ रही तनहाई दूर है लेकिन,
अदब में उसकी खड़ा होता जा रहा हूँ।

दुनिया के लिए पत्थर से मैं मोम हुआ,
और खुद के लिए कड़ा होता जा रहा हूँ।

अनमोल रत्न

एक अमूल्य संकलन

अपनी बात

भावनाओं के संप्रेषण का माध्यम।

नजरिया

बात जो है खास ....

Civil Services Exam Help

A brief and to the point view and materials on BPSC , JPSC and UPSC Exams

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कोशिश मशीनी पड़ रहे मस्तिष्क में भावना-प्रवाह की'

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अनोखा

साफ कहना, सुखी रहना

यह भी खूब रही

यह भी खूब रही। (Yah bhi khoob rahi)

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