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दीये का स्पष्टीकरण

दीया

मैं सतत् अपने स्वभाव से जलता हूँ,

ना तुम्हारे कम होने से कम होता हूँ,

ना तुम्हारे बढ़ने से बढ़ता हूँ,

मेरी बात क्यों नहीं मानते…?

मैं सच कह रहा हूँ ऐ अंधकार!

मैं सतत् अपने स्वभाव से जलता हूँ…।

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मैं करता रहा अपनाने की कोशिश…

मैं करता रहा अपनाने की कोशिश,
वो करते रहे आज़माने की कोशिश…

ये दुनिया है या कोई बियाबान है?
हर तरफ निर्बलों को दबाने की कोशिश…

खुद अपने को हम सुन ना पाए कभी,
फिर भी दुनिया को हर दम सुनाने की कोशिश…

ये शऊर दुनिया में कहाँ से है आया,
हर तरफ रिश्तों को भुनाने की कोशिश…

हर महफिल में जाते लगाकर मुखौटा,
खुद के सच को हमेशा छिपाने की कोशिश…

इस अज़ब रेस में आ गया कहाँ से?
यहाँ दौड़ने से ज्यादा गिराने की कोशिश…

बस ख़यालों में मेरे बसा एक तू ही,
हर पल तेरी मूरत बनाने की कोशिश…।

अज़ब कि तू मुझसे रू-ब-रू है…

जहाँ तक आरजू जाती है मेरी
वहाँ तक सिर्फ तेरी आरज़ू है

जितनी राहें तुझ तक जा रही हैं
वहाँ पर सिर्फ तेरी जुस्तज़ू है

अजब ये तुझसे मेरी गुफ्तगू है
मेरे हर लफ़्ज़ में छिपा सिर्फ तू है

हुआ ना मैं कभी रू-ब-रू खुद से
अज़ब कि तू मुझसे रू-ब-रू है।

कच्चे पारे की मूरत…

लाख कोशिशें कर लो
वो
किसी के
हाथ
नहीं आएगी
वो
कच्चे पारे की
मूरत है
जितना
पकड़ना चाहोगे
टूटती ही जाएगी
बिखरती ही जाएगी
इसलिए
बेहतर है कि
उसका दीदार
दूर से ही करो…।

“सच्चा मित्र”

शब्द ही बताता है
कि
किसी मित्र ने
सरेशाम
लूट ली होगी
मित्रता की इज्जत
भरे बाजार में…
घोप दिया होगा
छुरा
चुपके से
मित्र की
पीठ में…
वरना…
मित्र का मतलब ही
‘सच्चा’
हुआ करता था
कभी…।

मौलिक रचना…

पलकें बन्द करते ही
बिछ जाते हैं
कितने ही
कोरे कागज
मेरे हृदय में

लिख जाते हैं
रोज
कितने ही अफसाने

इन कागजों की डोर
मेरी पलकों में बँधी लगती है
क्योंकि
पलकें खोलते ही
सारे अफसाने
हो जाते हैं गायब

और
जब तुम कहते हो
कि
पढ़नी है मेरी मौलिक रचना
तो
कलम, कागज, दवात लेकर
लिख देता हूँ
एक रचना
जो निश्चित ही
मेरे अवचेतन की रचना
नहीं होती

जबकि
मेरी मौलिक रचना
मेरे अचेतन में लिखी जा रही होती है

जो
अभी तक की वैज्ञानिक खोजों के अनुसार
किसी भी सोशल नेटवर्किंग साईट पर
अपडेट नहीं हो सकता
किसी भी मोबाइल से
एस एम एस नहीं हो सकता
किसी भी ई-मेल में
अटैच नहीं हो सकता

उसको पढ़ने के लिए
चाहिए ही होता है
वक्त

जो शायद कभी भी
हमने
एक-दूसरे को दिया ही नहीं

और
मेरे चेहरे की मुस्कुराहट की तरह
तुम
उस रचना की भी तारीफ कर देते हो
जो
शायद कभी मेरी मौलिक होती ही नहीं…

आईना…

आईना
जितना कमजोर होता है,
इरादों से
उतना ही मजबूत
होता है,
वह
प्रत्यक्ष को
दिखलाने वाला होता है,
जितने टुकड़े करो उसके
वह
उतने ही पुरजोर तरीके से
सच का प्रस्तुतकर्ता
होता है।

फिर भी…

उसमें वो हर ख़ूबी,

जो ख़ुद में

नहीं लाना चाहता हूँ मैं,

फिर भी,

अपने नक़ाब में

समाना चाहता हूँ मैं…।

ऐसे – ऐसे मंज़र देखे हैं…

हमने तो ऐसे – ऐसे मंज़र देखे हैं,
जहाँ कोई रस्ता नहीं जाता वहाँ पर घर देखे हैं।

जिन लोगों को हरदम खिलखिलाते देखा,
उन सब लोगों के चश्म हमने तर देखे हैं।

उन्हें सहारा कभी किसी का नहीं चाहिए,
जिनकी पीठ पर बोझ हम हरदम देखे हैं।

ये मत पूछो हमसे हमपे क्या गुजरा है,
दिल से पूछो उसने कितने सितम देखे हैं।

सारी बर्फ सारे पत्थर पिघल ना जाएँ,
इसीलिए लब पर पहरे हरदम देखे हैं।

मानते हैं हम कि उम्र अभी हमारी कम है,
लेकिन हमने तुमसे ज्यादा मौसम देखे हैं।

दुनिया को दुनिया में हमने उलझा देखा,
लेकिन अपने को अपने ही में रम देखे हैं।

खुद को ग़ज़ल में शरण दे रहा हूँ…

जो सींचा है अब तक वो शज़र दे रहा हूँ,
मैं खुद को ग़ज़ल में शरण दे रहा हूँ।

जो अब तक थी दिल में वो दिल ही ने जानी,
दुनिया को नहीं दी ज़रा भी निशानी,
सबके पूर्वाग्रहों में खलल दे रहा हूँ,
मैं खुद को ग़ज़ल में शरण दे रहा हूँ।

दुनिया के भ्रम को तो पाला था अब तक,
सबकी नज़रों से खुद को छुपाया था अब तक,
धीरे-धीरे मैं खुद को शकल दे रहा हूँ,
मैं खुद को ग़ज़ल में शरण दे रहा हूँ।

पूछना आपका…

पूछना आपका
कि
हाल कैसा है?
कहते हुए
कि
‘अच्छा है’
दिल में
मलाल
कैसा है!!!

आदमी से मुखौटा होता जा रहा हूँ…

ज्यों-ज्यों बड़ा होता जा रहा हूँ ,
आदमी से मुखौटा होता जा रहा हूँ।

भीड़ पूजा मेरी करने लगी है,
मैं मूर्ति सा जड़ होता जा रहा हूँ।

आ रही तनहाई दूर है लेकिन,
अदब में उसकी खड़ा होता जा रहा हूँ।

दुनिया के लिए पत्थर से मैं मोम हुआ,
और खुद के लिए कड़ा होता जा रहा हूँ।

हर कोई…

हर कोई
अपने
दुःखों में
तर मिलता है,

जब कोई
कंधा
तलाशता हूँ
तो
सर
मिलता है।

पत्थर

अरे मुसाफिरों!
मुझे
इस तरह से ना कुचलो
क्योंकि
वह दिन दूर नहीं
जब तुम
मुझे
किसी मंदिर में
स्थापित पाओगे
और
मुझसे ही
अपनी
मनोकामनाओं की
पूर्ति चाहोगे
इसलिए
अरे मुसाफिरों
मुझे
इस तरह से ना कुचलो।

कह रही है मंज़िल…

कह रही है मंज़िल हमें पाकर तो देखिए-२
खुद ही बढ़ जाएँगे कदम उठाकर तो देखिए
ये तो मील के पत्थर हैं इनसे कैसी मोहब्बत-२
बहुत मिल जाएँगे आगे कहीं जाकर तो देखिए
साहिल तो मिल जाएँगे सुंदर से सुंदर-२
दरिया के रास्ते से जाकर तो देखिए
बहुत मिल जाएँगे तुमको नायाब खिलौने-२
कुम्हार के घर दस्तक बजाकर तो देखिए
ना होगा कोई द्वेष कोई राग किसी के मन में-२
यहीं पे छोड़कर उनको, मंज़िल पाकर तो देखिए
मिल जाएँगे छूटे हुए सब राही आपको-२
मंजिल पे पहुँचकर, आँख घुमाकर तो देखिए
कह रही है मंज़िल हमें पाकर तो देखिए
खुद ही बढ़ जाएँगे कदम उठाकर तो देखिए।

हम किस ओर जा रहे हैं…

जिन पैरों के नीचे अपनी गर्दन फँसी हुई हो उन पैरों को सहलाते रहने में ही अपनी भलाई होती है। प्रेमचंद जी ने बहुत पहले जो रेखाचित्र किसानों का खींचा था वह आज भी वैसा का वैसा ही देखा जा सकता है, बशर्ते इस बीच गंगा में काफी पानी बह चुका है। देश अपनी गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ चुका है और ‘राय साहब’ जैसी उपाधियों को बाँटे जाने का सिलसिला खत्म हो चुका है, जमीदारी प्रतिबंधित हो गई है। लोकतांत्रिक रूप से १५ चुनाव संपन्न हो चुके हैं। जनता लगभग सभी दलों पर भरोसा करके देख चुकी है फिर भी इस कृषि प्रधान देश का किसान आज भी आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहा है। उस वक्त जब देश गुलाम था और प्रेमचंद जी ने गोदान की रचना की थी तब अँग्रेजों के ज़माने के किसान ने भी जीवन के प्रति आशा इतनी कभी नहीं छोड़ी थी कि आत्महत्या कर ले। गोदान का नायक होरी भी किसान से मजदूर बन गया था और लगातार विपन्नता को सहते हुए भी आत्महत्या नहीं की थी, वह अत्यधिक काम करने के कारण मरा था। किन्तु आज के आजाद भारत का किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है। कहा जाता है कि हमारे देश के किसान में जीवटता इतनी अधिक होती है कि अगर कोई शख्स सबसे अंत में आत्महत्या करेगा तो वह किसान होगा अर्थात् वह तभी आत्महत्या करता है जब जीवित रहने का कोई विकल्प ही नहीं रह जाता।

एक तरफ विकास के सरकारी आँकड़े जो कि बहुत जल्द ही भारत को विकसित बना देने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था की इकाई किसान की आत्महत्याओं की दिन-प्रतिदिन आती खबरों को देखता हूँ तो पशोपेश में पड़ जाता हूँ कि सच क्या है? असमंजस और बढ़ जाता है जब बाज़ार में जाकर आटे-दाल का भाव मालूम करता हूँ कि कृषि पदार्थों के दाम आकाश छू रहे हैं फिर माननीय कृषि मंत्री जी का बयान कि दाम बढ़ाने में किसानों का हाथ है।
अगर बढ़े हुए दामों का फायदा किसानों को मिल रहा है तो फिर वे आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? और अगर किसान मजबूर होकर आत्महत्या कर रहे हैं तो फिर क्या भारत का विकास हो रहा है? खासकर गांधी के भारत का जो कि गाँव में बसता है?
ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो कि आम आदमी के दिमाग में उठते तो हैं लेकिन इस कागजी लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व ‘चुनाव’ के दौरान संविधान नाम की एक बहुत पुरानी किताब में वर्णित आचार संहिता का उल्लंघन करके बँटवाई गई शराब के नशे में ये आम आदमी कुछ दिनों के लिए भूल जाता है नेताओं द्वारा बाँटे गए अन्य उपहारों के नशे में चूर होकर मतदान कर आता है। चुनाव परिणाम आते ही उसका नशा चूर-चूर हो जाता है किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्योंकि उस संविधान नामक पुरानी किताब में जनप्रतिनिधियों को जनता द्वारा अपदस्थ करने का कोई प्रावधान नहीं लिखा गया था। आज किसी भी सांसद की कल्पना करते हुए गाड़ियों का काफिला तो याद आता है किंतु गली-मोहल्ले में बैठक कर समाज की समस्याओं को सुलझाते हुए किसी चेहरे की कल्पना हमारा मन नहीं कर पाता।
हमारी अर्थव्यवस्था की इकाई किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ रहा है अतः कहा जा सकता है कि स्थिति अँग्रेजी राज से भी बदतर हो चुकी है। तब हम जानते थे कि गोरी चमड़ी वाले अँग्रजों को देश से निकाल बाहर करना है किन्तु आज मानवता के दुश्मनों की पहचान गोरी चमड़ी नहीं रही और हम उनको देश से बाहर भी नहीं निकाल सकते।
देश को आजादी दिलाने के बाद जो जनता चैन की नींद सोने चली गई थी उसको अपनी सामाजिक चेतना जागृत करने का समय आ गया है। अब समय आ गया है कि हम जाति, धर्म व संप्रदाय के नाम पर हो रही राजनीति को तिलांजलि देकर विकास को प्रमुख मुद्दा बनाएँ और सबसे बड़ी बात कि हम विकास के लिए केवल सरकार पर ही निर्भर ना रहें। हम स्वयं ही विकास की पहल करें और मानवजाति की सेवा में निस्वार्थ भाव से अपनी क्षमताओं के अनुसार लग जाएँ।

बना लिया है अब खुद में समन्दर अपना…

मैं ही नाविक हूँ, मैं ही साहिल अपना;
बना लिया है अब खुद में समन्दर अपना।

इस कदर बिखरा हूँ मैं तिनका-तिनका
कि हर बनावट में नज़र आता है कुछ-कुछ नक्श अपना।

खुद में बनते हैं और खुद में बिखर जाते हैं,
अरमां भी सीख गए हैं अब रंग अपना।

खुद अपने मसीहा हैं खुद अपने पुजारी,
खुद चाहता हूँ पसंद करे ना कोई संग अपना।

खुद ही शुरू हुआ था मैं अपने आप से,
खुद ही लिख रहा हूँ अब समापन अपना।

ज़िन्दगी को आज़माकर देख ले…

ज़िन्दगी जीते हुए मुद्दत हुई,
ज़िन्दगी को आज़माकर देख ले।
कौन किसको कितनी हद तक जानता है,
आज एक-दूजे को बताकर देख ले।
ज़िन्दगी जीते हुए…

थम गए थे जो कदम तन्हाइयों में,
साथ मिलकर वो बढ़ाकर देख ले।
ज़िन्दगी जीते हुए…

गर रुके तो डूब जाओगे यहीं,
इस नदी के पार जाकर देख ले।
ज़िन्दगी जीते हुए…

किस कदर जीते हैं उसके हिज्र में,
कोई दिल के पास आकर देख ले।
ज़िन्दगी जीते हुए…

हर तिश्नाकाम की बुझ जाएगी हर तिश्नगी,
उस ज़ाम को इक बार जो लब पे लगाकर देख ले।
ज़िन्दगी जीते हुए मुद्दत हुई,
ज़िन्दगी को आज़माकर देख ले।

*
हिज्र=वियोग
तिश्नाकाम=प्यासा
तिश्नगी=प्यास

तेरा लाख-लाख शुक्रिया…..

ऐ खुदा !
तेरा लाख-लाख शुक्रिया
कि तूने
मुझे उन
शब्दों से परिपूर्ण
नहीं बनाया
जिनसे मैं
अपने दिल की सारी बातें
जाहिर कर सकता
क्योंकि
दिल और बातों के
इस संघर्ष से ही
मेरा दिल धड़कता है
अगर,
मेरे दिल की सारी बातें
जाहिर हो जाएँ
तो शायद
मेरा दिल
धड़कना छोड़ दे!
इसलिए
ऐ खुदा
तेरा लाख-लाख शुक्रिया ।

कदम तो बढ़ रहे हैं…

कदम तो बढ़ रहे हैं और बढ़ते ही रहेंगे अब
कि मंजिलों को छोटा और करते ही रहेंगे अब
कि आने वाली बाधाओं इतना जान लो अब तुम
कि तुमसे लड़ रहे थे और लड़ते ही रहेंगे अब!

अनमोल रत्न

एक अमूल्य संकलन

अपनी बात

भावनाओं के संप्रेषण का माध्यम।

नजरिया

बात जो है खास ....

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Swapnesh Chauhan

जिसके आगे राह नहीं...

अनोखा

साफ कहना, सुखी रहना

यह भी खूब रही

यह भी खूब रही। (Yah bhi khoob rahi)

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