Archive for the ‘कविता’ Category

तुम्हारी बज़्म में मेरी अब जगह ही नहीं…

खामोशियाँ

तुम्हारी बज़्म में मेरी अब जगह ही नहीं,

अदब में झुकने का मतलब नहीं, कि अना ही नहीं…

शिकवे भी बहुत थे, बहुत थी तारीफ़ें

खामोशियाँ चीखती रहीं पर तूने कभी सुना ही नहीं…

सच की हिफ़ाज़त में खुद को फ़ना कर जाएँ,

तमाम क़ाफ़िलों में अब ये तमन्ना ही नहीं…

हमारे सामने जो हमज़ुबाँ थे उनमें से,

मुंसिफे-दरबार में देखा कि किसी की जुबाँ ही नहीं…।

फिर उन्हीं हालात से सामना होगा

बाहर निकलूँगा तो फिर उन्हीं हालात से सामना होगा
धूप में नहाई हुई रात से सामना होगा
खुद में दबाए हुए जज़्बात से सामना होगा
जाने पहचाने मुखौटों में मिलेंगे सारे अजनबी
फिर ग़मों का हँसी की बरसात में सामना होगा
बाहर निकलूँगा तो फिर उन्हीं हालात से सामना होगा।

फिर मुझे अपना अक्स दिखेगा किसी के अन्दर
फिर उमड़ेगा भावनाओं का किसी के लिए दिल में समन्दर
फिर मुझे दिल पे किसी आघात का सामना होगा
बाहर निकलूँगा तो फिर उन्हीं हालात से सामना होगा।

दोस्ती में छुपी अदावत से सामना होगा
रोज अपनों की बग़ावत से सामना होगा
मंजिल की होड़ में दौड़ती लाशों से सामना होगा
फिर रकीबों से हसीं मुलाकात में सामना होगा
बाहर निकलूँगा तो फिर उन्हीं हालात से सामना होगा।

जहाँ मेरे शब्द नहीं जाते…

ऐसी कौन सी जगह जहाँ मेरे शब्द नहीं जाते,
जहाँ-जहाँ जाता हूँ मैं बस वहीं नहीं जाते।

मुझे भी आदमियों की अब समझ होने लगी,
तभी तो अब हर किसी के करीब हम नहीं जाते।

तुम्हारी फितरत कि आम तुम कभी बन नहीं सकते,
हमारा उसूल कि किसी खास के दर पर हम नहीं जाते।

जो जाते हैं तो दिन भर में हजारों बार जाते हैं,
नहीं जाते तो ता-उम्र किसी के घर नहीं जाते।

यहाँ पर कौन सी मंजिल को पाने के लिए आया,
यहाँ तो दूर-दूर तक कहीं रस्ते नहीं जाते।

हाथ का ख़ंज़र नजर आने लगा है…

अच्छा हुआ कि तेरा बुरा वक्त अब जाने लगा है,
कम से कम तेरा असली चेहरा नजर आने लगा है…

इस सफर के आखिरी दौर तक हमसफ़र बनके जो रहा,
छुपा हुआ उसके हाथ का ख़ंज़र नजर आने लगा है…

कौन जाने किस जगह कब साथ मेरा छोड़ दे तू,
अब तुझे मुझसे हसीं हर हमसफ़र नजर आने लगा है…

आखिरी वक्त तक जो साथ निभाने का वादा किये थे,
हर उस वादे का अब आखिरी वक्त नजर आने लगा है…

अपने ख़ूँ से जिस शजर को सींचता आया अभी तक,
मेरे ही ख़ूँ का प्यासा अब वो शज़र नज़र आने लगा है…

देखना है किसके हक में आएगा अब तेरा फैसला,
ऐ ख़ुदा! इंसान तुझसे खौफज़द नज़र आने लगा है।

विसंग‍‍ति…

क्‍या रिम‍-झिम बरसात हुई है…!

मिट गए होंगे वो शब्‍द
जो लिखे गए होंगे रेत पर
आसानी से‍ अपनी बात कह सकने के लिए…

अभी अभी जो बने थे
रेत के घर
हो गए होंगे अस्‍तित्‍वहीन…

रह गए होंगे
केवल वे संवाद
जो लिखे गए होंगे किसी पत्‍थर पर
किसी पत्‍थर के द्वारा…

बच गया होगा केवल उनका अस्‍तित्‍व
जिन‍के घर की दीवारें
सक्षम हैं
प्रकृति को
उनके घर के बाहर ही रोक पाने में…

सोचकर चले थे कि रस्ता छोटा है…

मर्ज़ जब लाइलाज़ होता है,
तभी क्यों जमकर इलाज़ होता है?

कश्ती चलाने को बादवाँ* काफी था,
नाखुदा* क्यों सवार होता है?

ज़िन्दा रहने पर शोक करते हैं लोग,
यहाँ मर जाने पर मल्हार होता है।

पुकार-पुकार के थक गया तुझको,
क्या सच है कि खुदा सोता है?

तुझे और सिर्फ तुझे चाहा किया,
तुझे पाकर ये यकीं नहीं होता है।

ये कैसा मोड़ है ज़िन्दगी तेरा,
यहाँ हर आदमी क्यों रोता है?

हर एक आँख का निशाना है जो,
वो आँख खोलकर आज सोता है।

मृग मरीचिकाओं से हूँ घिरा हुआ,
अब मेरी आँख भी एक धोखा है।

नए दौर में हो जाएगा नीलाम,
सम्भालकर रखना जो सिक्का खोटा है।

बहुत दूर निकल आए अपने घर से हम,
सोचकर चले थे कि रस्ता छोटा है।

*बादवाँ= पाल (जिससे हवा के सहारे नाव चलती है)
*नाखुदा= नाविक

कागज़ पे बिखर जाता हूँ…

नक्श-ए-इमरोज* से आगे जब निगाह दौड़ाता हूँ,
खुद को फैला हर जगह और खुद में सिमटा हुआ पाता हूँ ।

जब कभी आज के हालात पर निगाह उठाता हूँ,
खुद को तन्हा दूर बहुत दूर तलक पाता हूँ ।

और जब अतीत के दरवाजे से गुजर आता हूँ,
खुद के टुकड़े जोड़कर कागज़ पे बिखर जाता हूँ…।

*इमरोज= वर्तमान

क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…

क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?
इस जहाँ के सुख में हँसने,
और
दुःख में रोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

क्या आजीविका कमाने और
खाने, पीने, सोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

अतीत की फसलें काटने
और नई बोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

इस समूचे संसार के
एक अदद कोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

जि़न्दगी की भागदौड़ में
अपने अस्तित्त्व को
अंततः खोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

जि़न्दगी की नदी में…

जि़न्दगी की नदी में
हर एक तट से
अलग
रहना पड़ेगा
हाँ!
तुम्हें बहना पड़ेगा,
हम करेंगे
भला क्या अर्पण?
हाँ!
तटों के
विसर्जन भार को
उम्र भर
सहना पड़ेगा,
हाँ!
तुम्हें बहना पड़ेगा।

अनमोल रत्न

एक अमूल्य संकलन

अपनी बात

भावनाओं के संप्रेषण का माध्यम।

नजरिया

बात जो है खास ....

Civil Services Exam Help

A brief and to the point view and materials on BPSC , JPSC and UPSC Exams

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