मौलिक रचना…

पलकें बन्द करते ही
बिछ जाते हैं
कितने ही
कोरे कागज
मेरे हृदय में

लिख जाते हैं
रोज
कितने ही अफसाने

इन कागजों की डोर
मेरी पलकों में बँधी लगती है
क्योंकि
पलकें खोलते ही
सारे अफसाने
हो जाते हैं गायब

और
जब तुम कहते हो
कि
पढ़नी है मेरी मौलिक रचना
तो
कलम, कागज, दवात लेकर
लिख देता हूँ
एक रचना
जो निश्चित ही
मेरे अवचेतन की रचना
नहीं होती

जबकि
मेरी मौलिक रचना
मेरे अचेतन में लिखी जा रही होती है

जो
अभी तक की वैज्ञानिक खोजों के अनुसार
किसी भी सोशल नेटवर्किंग साईट पर
अपडेट नहीं हो सकता
किसी भी मोबाइल से
एस एम एस नहीं हो सकता
किसी भी ई-मेल में
अटैच नहीं हो सकता

उसको पढ़ने के लिए
चाहिए ही होता है
वक्त

जो शायद कभी भी
हमने
एक-दूसरे को दिया ही नहीं

और
मेरे चेहरे की मुस्कुराहट की तरह
तुम
उस रचना की भी तारीफ कर देते हो
जो
शायद कभी मेरी मौलिक होती ही नहीं…

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9 responses to this post.

  1. ye bhi apki maulic rachna nahi hai par fir bhi tarir to karungi hi q ki ye apki maulikta ki gehraiyo ki taraf sanket jarur kar rahi hai………..bahut khuub……..

    प्रतिक्रिया

  2. ati sundar sahityakar mahoday apni maulikta ko sabdon se vyakt kar hi diya

    प्रतिक्रिया

  3. bahut khub hai aapki maulik rachna aur bahut kuch chupa bhi hai is maulikta me.

    प्रतिक्रिया

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