मैं करता रहा अपनाने की कोशिश…

मैं करता रहा अपनाने की कोशिश,
वो करते रहे आज़माने की कोशिश…

ये दुनिया है या कोई बियाबान है?
हर तरफ निर्बलों को दबाने की कोशिश…

खुद अपने को हम सुन ना पाए कभी,
फिर भी दुनिया को हर दम सुनाने की कोशिश…

ये शऊर दुनिया में कहाँ से है आया,
हर तरफ रिश्तों को भुनाने की कोशिश…

हर महफिल में जाते लगाकर मुखौटा,
खुद के सच को हमेशा छिपाने की कोशिश…

इस अज़ब रेस में आ गया कहाँ से?
यहाँ दौड़ने से ज्यादा गिराने की कोशिश…

बस ख़यालों में मेरे बसा एक तू ही,
हर पल तेरी मूरत बनाने की कोशिश…।

फिर उन्हीं हालात से सामना होगा

बाहर निकलूँगा तो फिर उन्हीं हालात से सामना होगा
धूप में नहाई हुई रात से सामना होगा
खुद में दबाए हुए जज़्बात से सामना होगा
जाने पहचाने मुखौटों में मिलेंगे सारे अजनबी
फिर ग़मों का हँसी की बरसात में सामना होगा
बाहर निकलूँगा तो फिर उन्हीं हालात से सामना होगा।

फिर मुझे अपना अक्स दिखेगा किसी के अन्दर
फिर उमड़ेगा भावनाओं का किसी के लिए दिल में समन्दर
फिर मुझे दिल पे किसी आघात का सामना होगा
बाहर निकलूँगा तो फिर उन्हीं हालात से सामना होगा।

दोस्ती में छुपी अदावत से सामना होगा
रोज अपनों की बग़ावत से सामना होगा
मंजिल की होड़ में दौड़ती लाशों से सामना होगा
फिर रकीबों से हसीं मुलाकात में सामना होगा
बाहर निकलूँगा तो फिर उन्हीं हालात से सामना होगा।

जहाँ मेरे शब्द नहीं जाते…

ऐसी कौन सी जगह जहाँ मेरे शब्द नहीं जाते,
जहाँ-जहाँ जाता हूँ मैं बस वहीं नहीं जाते।

मुझे भी आदमियों की अब समझ होने लगी,
तभी तो अब हर किसी के करीब हम नहीं जाते।

तुम्हारी फितरत कि आम तुम कभी बन नहीं सकते,
हमारा उसूल कि किसी खास के दर पर हम नहीं जाते।

जो जाते हैं तो दिन भर में हजारों बार जाते हैं,
नहीं जाते तो ता-उम्र किसी के घर नहीं जाते।

यहाँ पर कौन सी मंजिल को पाने के लिए आया,
यहाँ तो दूर-दूर तक कहीं रस्ते नहीं जाते।

हाथ का ख़ंज़र नजर आने लगा है…

अच्छा हुआ कि तेरा बुरा वक्त अब जाने लगा है,
कम से कम तेरा असली चेहरा नजर आने लगा है…

इस सफर के आखिरी दौर तक हमसफ़र बनके जो रहा,
छुपा हुआ उसके हाथ का ख़ंज़र नजर आने लगा है…

कौन जाने किस जगह कब साथ मेरा छोड़ दे तू,
अब तुझे मुझसे हसीं हर हमसफ़र नजर आने लगा है…

आखिरी वक्त तक जो साथ निभाने का वादा किये थे,
हर उस वादे का अब आखिरी वक्त नजर आने लगा है…

अपने ख़ूँ से जिस शजर को सींचता आया अभी तक,
मेरे ही ख़ूँ का प्यासा अब वो शज़र नज़र आने लगा है…

देखना है किसके हक में आएगा अब तेरा फैसला,
ऐ ख़ुदा! इंसान तुझसे खौफज़द नज़र आने लगा है।

विसंग‍‍ति…

क्‍या रिम‍-झिम बरसात हुई है…!

मिट गए होंगे वो शब्‍द
जो लिखे गए होंगे रेत पर
आसानी से‍ अपनी बात कह सकने के लिए…

अभी अभी जो बने थे
रेत के घर
हो गए होंगे अस्‍तित्‍वहीन…

रह गए होंगे
केवल वे संवाद
जो लिखे गए होंगे किसी पत्‍थर पर
किसी पत्‍थर के द्वारा…

बच गया होगा केवल उनका अस्‍तित्‍व
जिन‍के घर की दीवारें
सक्षम हैं
प्रकृति को
उनके घर के बाहर ही रोक पाने में…

जीने वालों के लिए नज़ीर हो गया हूँ…

तुमसे जितना ज़्यादा मैं दूर हो गया हूँ,
खुद के नशे में उतना ही चूर हो गया हूँ…।

तुम साथ होते तो अधूरा ही रहता,
तुम्हारे बिन सम्पूर्ण हो गया हूँ…।

अब मुड़ना यहाँ से मुनासिब नहीं है,
पीछे वालों के लिए मैं पीर हो गया हूँ…।

कभी जीना भी था मुहाल और अब,
जीने वालों के लिए नज़ीर हो गया हूँ…।

तूफान में अकेला दिया…

भयंकर तूफान में अकेला दिया मैं जल रहा हूँ,
बस इसी कारण हर किसी को ख़ल रहा हूँ…।

हर कदम पे ठोकरें मार देता है ज़माना,
बस इसी कारण आज तक मैं चल रहा हूँ…।

एक बस तूने मुझे आज तक ठुकराया नहीं,
हर दर से ठोकर खाकर इसीलिए मचल रहा हूँ…।

सफ़र का अन्त तेरे दीदार से करना है मुझे,
विष से सिंचित होकर भी इसीलिए तो फल रहा हूँ…।

मौत भी आएगी मुझे हर वादा निभाने के बाद,
आज तक मैं अपनी हर बात पर अटल रहा हूँ…।

सोचकर चले थे कि रस्ता छोटा है…

मर्ज़ जब लाइलाज़ होता है,
तभी क्यों जमकर इलाज़ होता है?

कश्ती चलाने को बादवाँ* काफी था,
नाखुदा* क्यों सवार होता है?

ज़िन्दा रहने पर शोक करते हैं लोग,
यहाँ मर जाने पर मल्हार होता है।

पुकार-पुकार के थक गया तुझको,
क्या सच है कि खुदा सोता है?

तुझे और सिर्फ तुझे चाहा किया,
तुझे पाकर ये यकीं नहीं होता है।

ये कैसा मोड़ है ज़िन्दगी तेरा,
यहाँ हर आदमी क्यों रोता है?

हर एक आँख का निशाना है जो,
वो आँख खोलकर आज सोता है।

मृग मरीचिकाओं से हूँ घिरा हुआ,
अब मेरी आँख भी एक धोखा है।

नए दौर में हो जाएगा नीलाम,
सम्भालकर रखना जो सिक्का खोटा है।

बहुत दूर निकल आए अपने घर से हम,
सोचकर चले थे कि रस्ता छोटा है।

*बादवाँ= पाल (जिससे हवा के सहारे नाव चलती है)
*नाखुदा= नाविक

कागज़ पे बिखर जाता हूँ…

नक्श-ए-इमरोज* से आगे जब निगाह दौड़ाता हूँ,
खुद को फैला हर जगह और खुद में सिमटा हुआ पाता हूँ ।

जब कभी आज के हालात पर निगाह उठाता हूँ,
खुद को तन्हा दूर बहुत दूर तलक पाता हूँ ।

और जब अतीत के दरवाजे से गुजर आता हूँ,
खुद के टुकड़े जोड़कर कागज़ पे बिखर जाता हूँ…।

*इमरोज= वर्तमान

क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…

क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?
इस जहाँ के सुख में हँसने,
और
दुःख में रोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

क्या आजीविका कमाने और
खाने, पीने, सोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

अतीत की फसलें काटने
और नई बोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

इस समूचे संसार के
एक अदद कोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

जि़न्दगी की भागदौड़ में
अपने अस्तित्त्व को
अंततः खोने के लिए हूँ?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?
क्या मैं भी बस होने के लिए हूँ…?

क्या खूब तेरी मेरी दासताँ…

क्या खूब तेरी मेरी दासताँ रही,
तू सामने रहा फिर भी दूरियाँ रहीं।

मिलते रहे हमेशा पर मिल ना सके कभी,
ना जाने कैसी तेरी मज़बूरियाँ रहीं?

हम तो हमेशा ही से तुम्हारे करीब रहे,
तुम्हारे ऐनक ही में कुछ कमजोरियाँ रहीं।

जब भी मिले वो हमसे तो दूर ही से मिले,
दुनिया की नज़रों में हमेशा करीबियाँ रहीं।

हम बखूबी जानते हैं उनके बोलने का मतलब,
दुनियावी शिष्टाचारों की बेडि़याँ रहीं।

अज़ब कि तू मुझसे रू-ब-रू है…

जहाँ तक आरजू जाती है मेरी
वहाँ तक सिर्फ तेरी आरज़ू है

जितनी राहें तुझ तक जा रही हैं
वहाँ पर सिर्फ तेरी जुस्तज़ू है

अजब ये तुझसे मेरी गुफ्तगू है
मेरे हर लफ़्ज़ में छिपा सिर्फ तू है

हुआ ना मैं कभी रू-ब-रू खुद से
अज़ब कि तू मुझसे रू-ब-रू है।

जि़न्दगी की नदी में…

जि़न्दगी की नदी में
हर एक तट से
अलग
रहना पड़ेगा
हाँ!
तुम्हें बहना पड़ेगा,
हम करेंगे
भला क्या अर्पण?
हाँ!
तटों के
विसर्जन भार को
उम्र भर
सहना पड़ेगा,
हाँ!
तुम्हें बहना पड़ेगा।

कच्चे पारे की मूरत…

लाख कोशिशें कर लो
वो
किसी के
हाथ
नहीं आएगी
वो
कच्चे पारे की
मूरत है
जितना
पकड़ना चाहोगे
टूटती ही जाएगी
बिखरती ही जाएगी
इसलिए
बेहतर है कि
उसका दीदार
दूर से ही करो…।

“सच्चा मित्र”

शब्द ही बताता है
कि
किसी मित्र ने
सरेशाम
लूट ली होगी
मित्रता की इज्जत
भरे बाजार में…
घोप दिया होगा
छुरा
चुपके से
मित्र की
पीठ में…
वरना…
मित्र का मतलब ही
‘सच्चा’
हुआ करता था
कभी…।

मौलिक रचना…

पलकें बन्द करते ही
बिछ जाते हैं
कितने ही
कोरे कागज
मेरे हृदय में

लिख जाते हैं
रोज
कितने ही अफसाने

इन कागजों की डोर
मेरी पलकों में बँधी लगती है
क्योंकि
पलकें खोलते ही
सारे अफसाने
हो जाते हैं गायब

और
जब तुम कहते हो
कि
पढ़नी है मेरी मौलिक रचना
तो
कलम, कागज, दवात लेकर
लिख देता हूँ
एक रचना
जो निश्चित ही
मेरे अवचेतन की रचना
नहीं होती

जबकि
मेरी मौलिक रचना
मेरे अचेतन में लिखी जा रही होती है

जो
अभी तक की वैज्ञानिक खोजों के अनुसार
किसी भी सोशल नेटवर्किंग साईट पर
अपडेट नहीं हो सकता
किसी भी मोबाइल से
एस एम एस नहीं हो सकता
किसी भी ई-मेल में
अटैच नहीं हो सकता

उसको पढ़ने के लिए
चाहिए ही होता है
वक्त

जो शायद कभी भी
हमने
एक-दूसरे को दिया ही नहीं

और
मेरे चेहरे की मुस्कुराहट की तरह
तुम
उस रचना की भी तारीफ कर देते हो
जो
शायद कभी मेरी मौलिक होती ही नहीं…

आईना…

आईना
जितना कमजोर होता है,
इरादों से
उतना ही मजबूत
होता है,
वह
प्रत्यक्ष को
दिखलाने वाला होता है,
जितने टुकड़े करो उसके
वह
उतने ही पुरजोर तरीके से
सच का प्रस्तुतकर्ता
होता है।

फिर भी…

उसमें वो हर ख़ूबी,

जो ख़ुद में

नहीं लाना चाहता हूँ मैं,

फिर भी,

अपने नक़ाब में

समाना चाहता हूँ मैं…।

ऐसे – ऐसे मंज़र देखे हैं…

हमने तो ऐसे – ऐसे मंज़र देखे हैं,
जहाँ कोई रस्ता नहीं जाता वहाँ पर घर देखे हैं।

जिन लोगों को हरदम खिलखिलाते देखा,
उन सब लोगों के चश्म हमने तर देखे हैं।

उन्हें सहारा कभी किसी का नहीं चाहिए,
जिनकी पीठ पर बोझ हम हरदम देखे हैं।

ये मत पूछो हमसे हमपे क्या गुजरा है,
दिल से पूछो उसने कितने सितम देखे हैं।

सारी बर्फ सारे पत्थर पिघल ना जाएँ,
इसीलिए लब पर पहरे हरदम देखे हैं।

मानते हैं हम कि उम्र अभी हमारी कम है,
लेकिन हमने तुमसे ज्यादा मौसम देखे हैं।

दुनिया को दुनिया में हमने उलझा देखा,
लेकिन अपने को अपने ही में रम देखे हैं।

खुद को ग़ज़ल में शरण दे रहा हूँ…

जो सींचा है अब तक वो शज़र दे रहा हूँ,
मैं खुद को ग़ज़ल में शरण दे रहा हूँ।

जो अब तक थी दिल में वो दिल ही ने जानी,
दुनिया को नहीं दी ज़रा भी निशानी,
सबके पूर्वाग्रहों में खलल दे रहा हूँ,
मैं खुद को ग़ज़ल में शरण दे रहा हूँ।

दुनिया के भ्रम को तो पाला था अब तक,
सबकी नज़रों से खुद को छुपाया था अब तक,
धीरे-धीरे मैं खुद को शकल दे रहा हूँ,
मैं खुद को ग़ज़ल में शरण दे रहा हूँ।

पूछना आपका…

पूछना आपका
कि
हाल कैसा है?
कहते हुए
कि
‘अच्छा है’
दिल में
मलाल
कैसा है!!!

आदमी से मुखौटा होता जा रहा हूँ…

ज्यों-ज्यों बड़ा होता जा रहा हूँ ,
आदमी से मुखौटा होता जा रहा हूँ।

भीड़ पूजा मेरी करने लगी है,
मैं मूर्ति सा जड़ होता जा रहा हूँ।

आ रही तनहाई दूर है लेकिन,
अदब में उसकी खड़ा होता जा रहा हूँ।

दुनिया के लिए पत्थर से मैं मोम हुआ,
और खुद के लिए कड़ा होता जा रहा हूँ।

हर कोई…

हर कोई
अपने
दुःखों में
तर मिलता है,

जब कोई
कंधा
तलाशता हूँ
तो
सर
मिलता है।

पत्थर

अरे मुसाफिरों!
मुझे
इस तरह से ना कुचलो
क्योंकि
वह दिन दूर नहीं
जब तुम
मुझे
किसी मंदिर में
स्थापित पाओगे
और
मुझसे ही
अपनी
मनोकामनाओं की
पूर्ति चाहोगे
इसलिए
अरे मुसाफिरों
मुझे
इस तरह से ना कुचलो।

कह रही है मंज़िल…

कह रही है मंज़िल हमें पाकर तो देखिए-२
खुद ही बढ़ जाएँगे कदम उठाकर तो देखिए
ये तो मील के पत्थर हैं इनसे कैसी मोहब्बत-२
बहुत मिल जाएँगे आगे कहीं जाकर तो देखिए
साहिल तो मिल जाएँगे सुंदर से सुंदर-२
दरिया के रास्ते से जाकर तो देखिए
बहुत मिल जाएँगे तुमको नायाब खिलौने-२
कुम्हार के घर दस्तक बजाकर तो देखिए
ना होगा कोई द्वेष कोई राग किसी के मन में-२
यहीं पे छोड़कर उनको, मंज़िल पाकर तो देखिए
मिल जाएँगे छूटे हुए सब राही आपको-२
मंजिल पे पहुँचकर, आँख घुमाकर तो देखिए
कह रही है मंज़िल हमें पाकर तो देखिए
खुद ही बढ़ जाएँगे कदम उठाकर तो देखिए।

हम किस ओर जा रहे हैं…

जिन पैरों के नीचे अपनी गर्दन फँसी हुई हो उन पैरों को सहलाते रहने में ही अपनी भलाई होती है। प्रेमचंद जी ने बहुत पहले जो रेखाचित्र किसानों का खींचा था वह आज भी वैसा का वैसा ही देखा जा सकता है, बशर्ते इस बीच गंगा में काफी पानी बह चुका है। देश अपनी गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ चुका है और ‘राय साहब’ जैसी उपाधियों को बाँटे जाने का सिलसिला खत्म हो चुका है, जमीदारी प्रतिबंधित हो गई है। लोकतांत्रिक रूप से १५ चुनाव संपन्न हो चुके हैं। जनता लगभग सभी दलों पर भरोसा करके देख चुकी है फिर भी इस कृषि प्रधान देश का किसान आज भी आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहा है। उस वक्त जब देश गुलाम था और प्रेमचंद जी ने गोदान की रचना की थी तब अँग्रेजों के ज़माने के किसान ने भी जीवन के प्रति आशा इतनी कभी नहीं छोड़ी थी कि आत्महत्या कर ले। गोदान का नायक होरी भी किसान से मजदूर बन गया था और लगातार विपन्नता को सहते हुए भी आत्महत्या नहीं की थी, वह अत्यधिक काम करने के कारण मरा था। किन्तु आज के आजाद भारत का किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है। कहा जाता है कि हमारे देश के किसान में जीवटता इतनी अधिक होती है कि अगर कोई शख्स सबसे अंत में आत्महत्या करेगा तो वह किसान होगा अर्थात् वह तभी आत्महत्या करता है जब जीवित रहने का कोई विकल्प ही नहीं रह जाता।

एक तरफ विकास के सरकारी आँकड़े जो कि बहुत जल्द ही भारत को विकसित बना देने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था की इकाई किसान की आत्महत्याओं की दिन-प्रतिदिन आती खबरों को देखता हूँ तो पशोपेश में पड़ जाता हूँ कि सच क्या है? असमंजस और बढ़ जाता है जब बाज़ार में जाकर आटे-दाल का भाव मालूम करता हूँ कि कृषि पदार्थों के दाम आकाश छू रहे हैं फिर माननीय कृषि मंत्री जी का बयान कि दाम बढ़ाने में किसानों का हाथ है।
अगर बढ़े हुए दामों का फायदा किसानों को मिल रहा है तो फिर वे आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? और अगर किसान मजबूर होकर आत्महत्या कर रहे हैं तो फिर क्या भारत का विकास हो रहा है? खासकर गांधी के भारत का जो कि गाँव में बसता है?
ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो कि आम आदमी के दिमाग में उठते तो हैं लेकिन इस कागजी लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व ‘चुनाव’ के दौरान संविधान नाम की एक बहुत पुरानी किताब में वर्णित आचार संहिता का उल्लंघन करके बँटवाई गई शराब के नशे में ये आम आदमी कुछ दिनों के लिए भूल जाता है नेताओं द्वारा बाँटे गए अन्य उपहारों के नशे में चूर होकर मतदान कर आता है। चुनाव परिणाम आते ही उसका नशा चूर-चूर हो जाता है किन्तु तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्योंकि उस संविधान नामक पुरानी किताब में जनप्रतिनिधियों को जनता द्वारा अपदस्थ करने का कोई प्रावधान नहीं लिखा गया था। आज किसी भी सांसद की कल्पना करते हुए गाड़ियों का काफिला तो याद आता है किंतु गली-मोहल्ले में बैठक कर समाज की समस्याओं को सुलझाते हुए किसी चेहरे की कल्पना हमारा मन नहीं कर पाता।
हमारी अर्थव्यवस्था की इकाई किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ रहा है अतः कहा जा सकता है कि स्थिति अँग्रेजी राज से भी बदतर हो चुकी है। तब हम जानते थे कि गोरी चमड़ी वाले अँग्रजों को देश से निकाल बाहर करना है किन्तु आज मानवता के दुश्मनों की पहचान गोरी चमड़ी नहीं रही और हम उनको देश से बाहर भी नहीं निकाल सकते।
देश को आजादी दिलाने के बाद जो जनता चैन की नींद सोने चली गई थी उसको अपनी सामाजिक चेतना जागृत करने का समय आ गया है। अब समय आ गया है कि हम जाति, धर्म व संप्रदाय के नाम पर हो रही राजनीति को तिलांजलि देकर विकास को प्रमुख मुद्दा बनाएँ और सबसे बड़ी बात कि हम विकास के लिए केवल सरकार पर ही निर्भर ना रहें। हम स्वयं ही विकास की पहल करें और मानवजाति की सेवा में निस्वार्थ भाव से अपनी क्षमताओं के अनुसार लग जाएँ।

बना लिया है अब खुद में समन्दर अपना…

मैं ही नाविक हूँ, मैं ही साहिल अपना;
बना लिया है अब खुद में समन्दर अपना।

इस कदर बिखरा हूँ मैं तिनका-तिनका
कि हर बनावट में नज़र आता है कुछ-कुछ नक्श अपना।

खुद में बनते हैं और खुद में बिखर जाते हैं,
अरमां भी सीख गए हैं अब रंग अपना।

खुद अपने मसीहा हैं खुद अपने पुजारी,
खुद चाहता हूँ पसंद करे ना कोई संग अपना।

खुद ही शुरू हुआ था मैं अपने आप से,
खुद ही लिख रहा हूँ अब समापन अपना।

ज़िन्दगी को आज़माकर देख ले…

ज़िन्दगी जीते हुए मुद्दत हुई,
ज़िन्दगी को आज़माकर देख ले।
कौन किसको कितनी हद तक जानता है,
आज एक-दूजे को बताकर देख ले।
ज़िन्दगी जीते हुए…

थम गए थे जो कदम तन्हाइयों में,
साथ मिलकर वो बढ़ाकर देख ले।
ज़िन्दगी जीते हुए…

गर रुके तो डूब जाओगे यहीं,
इस नदी के पार जाकर देख ले।
ज़िन्दगी जीते हुए…

किस कदर जीते हैं उसके हिज्र में,
कोई दिल के पास आकर देख ले।
ज़िन्दगी जीते हुए…

हर तिश्नाकाम की बुझ जाएगी हर तिश्नगी,
उस ज़ाम को इक बार जो लब पे लगाकर देख ले।
ज़िन्दगी जीते हुए मुद्दत हुई,
ज़िन्दगी को आज़माकर देख ले।

*
हिज्र=वियोग
तिश्नाकाम=प्यासा
तिश्नगी=प्यास

तेरा लाख-लाख शुक्रिया…..

ऐ खुदा !
तेरा लाख-लाख शुक्रिया
कि तूने
मुझे उन
शब्दों से परिपूर्ण
नहीं बनाया
जिनसे मैं
अपने दिल की सारी बातें
जाहिर कर सकता
क्योंकि
दिल और बातों के
इस संघर्ष से ही
मेरा दिल धड़कता है
अगर,
मेरे दिल की सारी बातें
जाहिर हो जाएँ
तो शायद
मेरा दिल
धड़कना छोड़ दे!
इसलिए
ऐ खुदा
तेरा लाख-लाख शुक्रिया ।

कदम तो बढ़ रहे हैं…

कदम तो बढ़ रहे हैं और बढ़ते ही रहेंगे अब
कि मंजिलों को छोटा और करते ही रहेंगे अब
कि आने वाली बाधाओं इतना जान लो अब तुम
कि तुमसे लड़ रहे थे और लड़ते ही रहेंगे अब!

अनमोल रत्न

एक अमूल्य संकलन

FLAUNTING THOUGHTS

WORDS OF HEART

अपनी बात

भावनाओं के संप्रेषण का माध्यम।

नजरिया

बात जो है खास ....

Civil Services Exam Help

A brief and to the point view and materials on BPSC , JPSC and UPSC Exams

जिसके आगे राह नहीं...

जिसके आगे राह नहीं...

जिसके आगे राह नहीं...

आखिरी पथ...

जिसके आगे राह नहीं...

sunrajak

जिसके आगे राह नहीं...

जिसके आगे राह नहीं...

संवेदना

कोशिश मशीनी पड़ रहे मस्तिष्क में भावना-प्रवाह की'

जिसके आगे राह नहीं...

जिसके आगे राह नहीं...

जिसके आगे राह नहीं...

Satasangi Lane, 824202

जिसके आगे राह नहीं...

जिसके आगे राह नहीं...

जिसके आगे राह नहीं...

अनोखा

साफ कहना, सुखी रहना

यह भी खूब रही

यह भी खूब रही। (Yah bhi khoob rahi)

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 717 other followers

%d bloggers like this: